Monday, 13 March 2017

तराईन की लढाई

तराइन की लड़ाई

सांकेतिक शब्द : तराइन की लड़ाई , तराइन की प्रथम लड़ाई , तराइन की दूसरी लड़ाई , तराइन का युद्ध

प्रधान भाग : राजपूतों द्वारा लड़ा गया पहला युद्ध तराइन की लड़ाई (1191 AD )  थी |इस युद्ध में चौहान राजवंश के पृथ्वी राज ने मुहम्मद गौरी को हरियाणा में थानेश्वर के निकट तराइन में पराजित कर दिया था | तराइन की दूसरी लड़ाई (1192 AD ) भी तराइन में ही लड़ी गई जिसमे मुहम्मद गौरी के द्वारा पृथ्वीराज को पराजित किया गया |

मुहम्मद गौरी कौन था ?

गौरी, गजनी के अधीन थे परंतु महमूद गजनी की मृत्यु के बाद उन्होने अपने आप को स्वाधीन घोषित कर दिया | मुईज़्ज़ुद्दीन मुहम्मद जिसे मुहम्मद गौरी के नाम से जाना जाता था, ने गज़्नाविद साम्राज्य के पतन के बाद गजनी को अपने नियंत्रण में कर लिया था | गजनी में अपना स्थान मजबूत और सुरक्षित करके मुहम्मद गौरी ने भारत पर ध्यान केन्द्रित किया और गजनी के महमूद की तरह भारत को जीतना चाहा था |

1175AD  में मुहम्मद गौरी ने मुल्तान  और  पूरे सिंध पर कब्जा कर लिया | 1186 में इसने पंजाब पर हमला किया और खुसरु मलिक से कब्ज़ा छीन लिया | उसके बाद इसने चौहान राज्य पर हमला किया |

तराइन की पहली लड़ाई (1191 AD)

पृथ्वीराज चौहान ने 1191 AD में दिल्ली के निकट तराइन की लड़ाई में गौरी को हरा दिया | इस हार का बदला लेने के लिए गौरी एक बड़ी सेना के साथ पेशावर और मुल्तान से होते हुए लाहौर आया और पृथ्वीराज चौहान पर आक्रमण कर दिया | चौहान ने बड़ी सेना एकत्रित की जिसमे 3,00,000 घोड़े, 3000 हाथी और पैदल सैनिकों की बड़ी फौज थी, कई हिन्दु राजा और प्रमुख भी उनके साथ जुड़ गए |   

तराइन की दूसरी लड़ाई (1192 AD)

1192 AD में तराइन की दूसरी लड़ाई में मुहम्मद गौरी ने पृथ्वीराज की सेना को बखूबी ढंग से पराजित किया | पृथ्वीराज को बंदी बना लिया और हत्या कर दी |

1206 में मुहम्मद गौरी की हत्या से पहले तुर्क ने गंगा यमुना दोआब और इसके पास के पड़ोसी क्षेत्रों बंगाल और बिहार को भी जीत लिया | तराइन की लड़ाई ने भारत के इतिहास में एक नए युग को जन्म दिया जैसे दास परंपरा  की शुरुआत  हुई |

तराइन की लड़ाई के प्रभाव

• राजपूतों की राजनीतिक प्रतिष्ठा को झटका लगा |
• भारत में पहला मुस्लिम राज्य की स्थापना हुई थी |
• मुहम्मद गौरी के प्रतिनिधि कुतब –उद-दीन ऐबक (1206-11) ने भारत में दिल्ली सल्तनत की स्थापना की |
• भारत के जोखिम को भांपते हुए दूसरे विदेशी आक्रमणकारियों ने भारत पर आक्रमण किया |

हर्षवर्धन काल

हर्षवर्धन काल

हर्षवर्धन पुष्यभूति राजवंश से संबंध रखता था जिसकी स्थापना नरवर्धन ने 5वीं या छठी शताब्दी ईस्वी के आरम्भ में की थी। यह केवल थानेश्वर के राजा प्रभाकर वर्धन (हर्षवर्धन के पिता) के अधीन था। पुष्यभूति समृद्ध राजवंश था और इसने महाराजाधिराज का खिताब प्राप्त किया था। हर्षवर्धन 606 ईस्वी में 16 वर्ष की आयु में तब सिंहासन का उत्तराधिकारी बना था जब उसके भाई राज्यवर्धन की शशांक द्वारा हत्या कर दी गयी थी जो गौड और मालवा के राजाओं का दमन करने निकला था। हर्ष को स्कालोट्टारपथनाथ के रूप में भी जाना जाता था। सिंहासन पर बैठने के बाद उसने अपनी बहन राज्यश्री को बचाया और एक असफल प्रयास के साथ शशांक की तरफ बढा था।

अपने दूसरे अभियान में, शशांक की मौत के बाद, उसने मगध और शशांक के साम्राज्य पर विजय प्राप्त की थी। उसने कन्नौज में अपनी राजधानी स्थापित की। एक बड़ी सेना के साथ, हर्षवर्धन ने अपने साम्राज्य को पंजाब से उत्तरी उड़ीसा तथा हिमालय से नर्मदा नदी के तट तक विस्तारित किया।  उसने नर्मदा से आगे भी अपने साम्राज्य को विस्तारित करने की कोशिश की लेकिन ऐसा करने में वह विफल रहा था। उसे बादामी के चालुक्य राजा पुलकेसिन द्वितीय के हाथों हार का सामना करना पड़ा था।  बाणभट्ट द्वारा लिखित “हर्षचरित्र” हर्ष की अवधि में एक सफल दस्तावेज के रूप में मौजूद है। चीनी विद्वान ह्वेनसांग जिसने हर्ष के शासन के दौरान यहा का दौरा किया था, की रचनाओं में भी हर्ष और हर्ष की अवधि के दौरान के भारत, के बारे में काफी विस्तार से वर्णन किया गया है। 647 ईस्वी में हर्षवर्धन की मृत्यु के साथ ही उसके साम्राज्य का भी अंत हो गया।

प्रशासन

हर्ष के साम्राज्य में राजस्व को चार भागों में विभाजित किया गया था। पहला भाग राजा पर खर्च किया जाता था। दूसरा भाग विद्वानों पर खर्च किया जाता था। तीसरा भाग सरकारी कर्मचारियों पर खर्च किया जाता था और चौथे भाग को धार्मिक गतिविधियों पर खर्च किया जाता था।

सामाजिक-आर्थिक और सांस्कृतिक व्यवस्था:

हर्ष के राज्य का दौरा करने वाले ह्वेनसांग के अनुसार, भारतीय समाज में जातीय व्यवस्था अस्तित्व में थी। इसके अलावा कई मिश्रित और उप जातियों का भी उदय हुआ था। ह्वेनसांग ने अछूत और जातिच्युत के अस्तित्व का भी उल्लेख किया है। इस अवधि के दौरान महिलाओं की स्थिति में भी काफी गिरावट आई थी। लेकिन फिर भी महिलाएं पुरुषों के अधीन नहीं मानी जाती थी। धार्मिक क्षेत्र में ब्राह्मणवाद का प्रभुत्व बौद्ध धर्म के पतन का कारण बना था। वैष्णव, शैव और जैन धर्म भी अस्तित्व में थे। हर्ष को उदार और धर्मनिरपेक्ष राजा माना जाता था। राजस्व का मुख्य स्रोत भूमि की उपज का छठा हिस्सा होती थी। कुछ अन्य कर बंदरगाहों,  घाटों आदि पर लगाए गए थे। शाही भूमि से प्राप्त लाभ, खदानों और जागीरदारी से अर्जित शाही खजाना भी राजस्व के स्त्रोत थे।

महत्वपूर्ण हस्तियां:

हर्षवर्धन के शासनकाल के दौरान दो महत्वपूर्ण हस्तियां थीं।

क) बाणभट्ट हर्ष के दरबार में एक कवि थे। उन्होंने हर्षवर्धन की जीवनी 'हर्षचरित' की रचना की जिसमें उन्होंने विस्तृत जानकारी के साथ हर्ष की शक्ति के उदय तक की प्रमुख घटनाओं का उल्लेख किया है। यह संस्कृत भाषा में लिखित थी। उन्होंने 'कादम्बरी' नामक एक नाटक भी लिखा था।

ख) ह्वेनसांग जो एक चीनी तीर्थयात्री था उसने भी हर्ष के साम्राज्य का दौरा किया था। चीन वापस जाने के बाद एक उसने 'शि-यू-की' (पश्चिम की दुनिया) नामक एक पुस्तक लिखी थी। हर्षवर्धन के साथ-साथ ह्वेनसांग ने अपनी पुस्तक में दो अन्य राजाओं- पल्लव वंश के नरसिंह वर्मन और चालुक्य वंश के पुलकेसिन द्वितीय की भी प्रशंसा की थी। वह अफगानिस्तान के माध्यम से मध्य एशिया में आया था और उसी मार्ग के माध्यम से वापस चला गया। ह्वेनसांग ने नालंदा में अध्ययन किया था और बाद में नौ वर्षों तक वहां शिक्षण भी किया था।

महत्वपूर्ण तथ्य

हर्षवर्धन, सीखने वालों के लिए एक महान संरक्षक था और उसने खुद संस्कृत नाटकों, नागनंद, रत्नावली और प्रियदर्शिका की रचना की थी।उसने कई विश्राम गृहों और अस्पतालों का निर्माण करवाया था।ह्वेनसांग ने कन्नौज में आयोजित भव्य सभा के बारे में उल्लेख किया है जिसमें बीस राजाओं, चार हजार बौद्ध भिक्षुओं और तीन हजार जैन तथा ब्राह्मणों ने भाग लिया था।हर्ष हर पांच साल के अंत में, प्रयाग (इलाहाबाद) में महामोक्ष हरिषद नामक एक धार्मिक उत्सव का आयोजन करता था। यहां पर वह दान समारोह आयोजित करता था।हर्षवर्धन ने अपनी आय को चार बराबर भागों में बांट रखा था जिनके नाम--शाही परिवार के लिए, सेना तथा प्रशासन के लिए, धार्मिक निधि के लिए और गरीबों और बेसहारों के लिए थे।ह्वेनसांग के अनुसार, हर्षवर्धन के पास एक कुशल सरकार थी। उसने यह भी उल्लेख किया है कि वहां परिवार पंजीकृत नहीं किये गये थे और कोई बेगार नहीं था। लेकिन नियमित रूप से होने वाली डकैती के बारे में उसे शिकायत थी।  पुलकेसिन द्वितीय के हाथों हर्षवर्धन की हार का उल्लेख ऐहोल शिलालेख (कर्नाटक) में किया गया है। वह पहला उत्तर भारतीय राजा था जिसे दक्षिण भारतीय राजा के हाथों पराजय का सामना करना पड़ा था।

महत्वपूर्ण घटनाएँ

 

वर्धन वंश की स्थापना पांचवी सदी के अंत या छठी शताब्दी ईस्वी के प्रारंभ के आसपास नरवर्धन द्वारा की गयी थी।हर्षवर्धन अपने बड़े भाई राज्यवर्धन की मृत्यु के बाद सोलह साल की उम्र में 606 ईस्वी में सिंहासन पर आसीन हुआ था।हर्ष ने अपनी बहन राज्यश्री को छुड़ाया था जिसे शशांक ने उसके पति ग्रहवर्मन की हत्या के बाद बंदी बना लिया था।ह्वेनसांग ने 631 ईस्वी में हर्ष के दरबार का दौरा किया था।हर्ष को 637 ईस्वी में पुलकेसिन द्वितीय से हार का सामना करना पड़ा था।643 ईस्वी में ह्वेनसांग के लिए कन्नौज में भव्य सभा का आयोजन किया गया था।647 ईस्वी में हर्ष का निधन हो गया था।

चोल साम्राज्य

चोल साम्राज्य ( 9वीं सदी A D से 12वीं सदी A D तक) 

बाद के चोल का युग 1070 A D से 1279 A D  तक रहा | इस समय तक चोल साम्राज्य ने अपने मुकाम को पा लिया था और विश्व का सबसे शक्तिशाली देश बन गया था | चोलाओं ने दक्षिण पूर्वी एशियन देशों पर कब्ज़ा कर लिया और इस समय इनके पास विश्व की सबसे शक्तिशाली सेना और जल सेना थीं |

चोल राज्य का पतन

चोल साम्राज्य मे संकट आने के साथ विराराजेन्द्र चोला का 1070 A D  में देहांत हो गया | आगे, विक्रमादित्य V I,उसके बेटे ने स्मरणीय प्रतिष्ठा हासिल की और जल्दी ही चोल समाज का उत्तरदायित्व संभालना  शुरू कर दिया | जब विराराजेन्द्र का स्वर्गवास हुआ था तब चोल साम्राज्य में एक विद्रोह(शायद धार्मिक ) था |  विक्रमादित्य V I गंगाईकोण्डा चोलपुरम में एक माह के लिए रहे और उसके बाद अपनी राजधानी में फिर दौरा किया |गंगाईकोण्डा चोलपुरम मे उन्होने अथिराजेन्द्र को नया राजा बना दिया | दूसरी तरफ, कुछ ही महीनों में अथिराजेन्द्र एक नए विद्रोह के झोंके में फंस गए | जब अथिराजेन्द्र की मृत्यु हो गई, तब राजेंद्र चोल ने चोल राजगद्दी को हथिया लिया | यह चोल राजाओं के आरंभ की एक नई लकीर थी जिसे बाद के चोलाओं के तौर पर जाना गया |

कुलोत्थुंगा चोल-I (1070-1120 A D )

राजेंद्र चोल-1 की पुत्री  अम्मानगा देवी का विवाह पूर्वी चौलक्याओं के वेंगी राजा राजराजा नरेंद्र के साथ हुआ | इस एकीकरण की संतान थी राजेंद्र चोल जोकि बाद मे कुलोत्थुंगा-1 बना | कुलोत्थुंगा चोल-1 ने कलिंग में 2 सैनिक कार्यवाही करीं | कुलोत्थुंगा के नेतृत्व में श्रीलंका को निकालकर पूर्ण साम्राज्य में एकीकरण रहा | फिर भी पश्चिमी चौलक्या और चोल के बीच तुंगभद्रा नदी एक बाह्य सतह की तरह थी | 1120 A D  में विक्रम चोल इसका उत्तराधिकारी बना | 

विक्रम चोल 1120- 1135 A D  

कुलोत्थुंगा चोल=1 ने विक्रम  चोल को वेंगी का राजपाल नियुक्त किया | इसका आहवान 1118 A D में हुआ और इसे राज्य प्रतिनिधि नियुक्त घोषित कर दिया गया | इसने अपने पिता कुल्लोत्थुंगा के साथ  शासन किया जब तक उसके पिता का देहांत 1122 A D  में नहीं हो गया | पश्चिमी चौल्क्या बहुत ऊंची उड़ान भर रहे थे और उन्होने पूर्वी चौलकयाओं पर आक्रमण कर वेंगी को जीत लिया | 1133 A D  में कुल्लोत्थुंगा चोल II, विक्रम चोल का उत्तराधिकारी बना |

कुलोत्थुंगा चोल II 1138 A D -1150 A D

कुलोत्थुंगा चोल II विक्रम चोल का बेटा व उत्तराधिकारी था | इसके खाते में कोई भी ऐतिहासिक लड़ाई नहीं है | वह चिदम्बरम मंदिरों की धन आदि से सहायता  करता था | 1150 A D में राजराज चोल II इसका उत्तराधिकारी बना |

राजाराज चोल II  1150 -1173 A D

कुल्लोथुंगा चोल III  ने राजाराज चोल को अपना वारिस 1146 A D मे बनाया | उसका पूरा नियंत्रण कलिंग, वेंगी, चेरा, पाण्ड्य आदि के क्षेत्रों  पर था और इसने श्रीलंका को भी हमला किया परंतु इसके प्रभुत्व के अंतिम सालों में इसके साम्राज्य, जो पहले पाण्ड्य का क्षेत्र था ने राजनैतिक अशांति देखी |उसके गुजर जाने से पहले, उसने राजाधिराज चोल II को 1163 A D में अपना वारिस बना दिया | इसका उत्तराधिकारी राजाधिराज चोल II बना | 

राजाधिराज चोल II 1166 A D – 1178 A D

राजाधिराज चोल II, राजराज चोल II का उत्तराधिकारी बना | इसका शासन काल में चोल राज्य को आगे के दोषों के लिए जाना गया  जिसमें  पाण्ड्य  के बीच आम जागीरदारों का आधिपत्य था | पाण्ड्य के बीच राजनैतिक युद्ध हो गया जिसमे चोलाओं के दखलंदाज़ी व देखरेख की आवश्यकता पड़ी | परंतु पाण्ड्य को  प्रसिद्धि मिलने शुरू हो गई और केंद्र चोल राज्य धीरे धीरे कमजोर पड़ने लगे | 1178 A D में कुलोथूङ्गा चोल II, राजराज चोल का उत्तराधिकारी बना |

कुलोत्थुंगा चोल III  1178 -1218 A D      

कुलोत्थुंगा चोल III वेनाद के चेराओं, मदुरै में पाण्ड्य, श्रीलंका के सिंहला राजाओं  और मैसूर के होयसलाओं को बंदी बनाने मे सक्षम हुआ  | सदी ने घुमाव लिया और चोल साम्राज्य के दस्ता युक्त राजा जतवर्मन कुलसेकरन I ने चोलाओं के विरूद्ध विद्रोह किया और साल 1290 में मदुरा  राजगद्दी पर जीत हासिल की |  चोलाओं ने उस पर आक्रमण किया और मदुरै को हथिया लिया | जतवर्मन कुलसेकरन I  ने अपनी पत्नी व बेटे के साथ चोल राजा कुलोत्थुंगा के सामने हथियार डाल दिये  और उसके आत्मसमर्पण  के बाद , वह अपनी राजधानी दोबारा गया | परंतु इसके दौरान, मदुरै में पहले  पाण्ड्य का राज्याभिषेक भवन नष्ट हो गया  और इसमें वे तमाम दस्तावेज भी नष्ट हो गए जिनमे पाण्ड्य की पहले की कुछ जानकारी थी | इस हमले का बदला लेने के लिए कुलसेकरन के छोटे भाई मारवर्मन सुंदरा पाण्ड्य, जो 1216 A D  में शासन में आया, ने चोल राज्य पर आक्रमण कर दिया | सुंदरा पाण्ड्य के राजाओं ने चोल राजाओं के थ्ंजौर और उरईयूर के शहरों पर कब्जा कर लिया और चोल राजाओं को देश से निकाल दिया |उसकी सेना ने चिदम्बरम तक की पद यात्रा की और उसकी विजय की याद मे चिदम्बरम मंदिर मे तुलाभारम  किया और उसके वज़न के बराबर धन का दान दिया | परंतु, चोलाओं के ऊपर सुंदर पाण्ड्य की विजय के लिए होयसला सेना ने सरी रंगापट्टम की ओर पदयात्रा की | होयसला राजा वीरा बाल्लला III के दाखल के बाद चोल राज्यों को लौटा दिया गया परंतु, अब चोलाओं ने सुंदर पाण्ड्य का आधिपत्य स्वीकार कर लिया | यह द्वितीय पाण्ड्य साम्राज्य का पुनः जागरण और शक्तिशाली चोल सत्ता का पतन था |

राजाराज चोल III 1216-1256 A D      

जुलाई 1216 में जब राजाराज चोल III की सत्ता आई , पूर्व चोलाओं की तुलना में चोल राज्य एक संक्षिप्त प्रांत था | पाण्ड्य का दक्षिण और वेंगी में अहम नियंत्रण था और दूसरे क्षेत्र होयसलाओं के अंदर थे | पाण्ड्य की सेना ने चोल राजधानी मे प्रवेश कर लिया और राजराज चोल III भाग गए | उन्हें सेंदमंगलम में कैद कर लिया गया | होयसला के राजा नरसिंहा ने दखल डाला और तभी चोल राजा को रिहा किया गया | राजराज चोल III ने अपने बेटे राजेन्द्र चोल को 1246 A D में वारिस बनाया |

राजेंद्र चोल III  1246- 1280 A D     

राजेंद्र चोल की प्रभुता 1246 A D मे आई | उसने चोल राज्यों के तेज़ी से हो रहे पतन को रोकना चाहा पर इस समय होयसला विरोधात्मक हो गए थे और पाण्ड्य प्रभावशाली बन गए थे | चोल राज्य का पतन राजेंद्र चोल के साथ हो गया |

चोल चेरा पांडय वंश

चोल, चेरा और पाण्ड्या राजवंश

दक्षिण भारतीय की तीन राजवंशों के बारे में विवरण नीचे दिया गया है :

चेरा राजवंश

चेरा राजवंशों ने दो विभिन्न कालों में शासन किया | प्रथम चेरा राजवंशों ने संगम युग में शासन किया  जबकि द्वितीय चेरा राजवंश ने 9वीं शताब्दी A D के आगे शासन किया |हमें चेरा राजवंश के बारे में संगम लेख के द्वारा पता चलता है | चेराओं द्वारा शासित क्षेत्रों में कोचीन, उत्तर त्रावणकोर और दक्षिणी मलाबार थे | इनकी राजधानी किज़्हंथुर –कंदल्लुर और करूर-वांची में वांची मुथुर थी | बाद के चेराओं की राजधानी कुलशेकरपुरम और महोदयापुरम थी | इनका  राजचिन्ह धनुष व तीर था | इनके द्वारा जारी किए गए सिक्कों पर धनुष यंत्र का चिन्ह अंकित होता था |

उठियान चेराला

इसे चेरा के प्रथम राजा के रूप मे दर्ज़ किया गया है | चोलाओं से हारने के बाद उसने आत्महत्या कर ली |

सेंगुत्तुवन इस राजवंशों का सबसे प्रसिद्ध शासक था | वह प्रसिद्ध तमिल महाकाव्य सिलापथिकरम का नायक था | इसने दक्षिण भारत से चीन को प्रथम राजदूत भेजा था | इसकी राजधानी करूर थी | इसकी जलसेना विश्व में सर्वोत्तम थी |

द्वितीय चेरा राजवंश

कुलशेखारा अलवर ने द्वितीय चेरा राजवंश की स्थापना की | इसकी राजधानी महोदयापुरम थी | द्वितीय चेरा राजवंश का रामा वर्मा कुलशेखरा अंतिम राजा था | इसने 1090 से 1102 A D तक शासन किया | इसके बाद चेरा राजवंश समाप्त हो गया |

चोल राजवंशों ने 300 B C से 13वीं शताब्दी के बाद तक शासन किया जबकि उनके प्रदेश बदलते रहे |  इनके शासन काल को तीन भागों मे विभाजित किया जा सकता है नामतः पूर्व चोल, मध्यकालीन चोल व बाद के चोला |

चोल राजवंश

पूर्व चोल

पूर्व चोलाओं के बारे में  ज़्यादातर जानकारी संगम साहित्य से मिली हैं | अन्य जानकारी हमें महावमसा , सीलॉन का बौद्ध लेख , अशोक के स्तंभों और एर्यथ्रेयान समुद्र के पेरिप्लुस से मिलती है |

कारिकला चोल पूर्व चोल का सबसे प्रसिद्ध राजा है | इसने 270 B C के लगभग शासन किया | इसने वेन्नी की मशहूर लड़ाई जीती जिसमे इसने पाण्ड्य और चेराओं को धोखे से हराया था | यह माना जाता है कि इसने पूर्ण सीलॉन को जीत किया था |

परंतु राजा होने के नाते इसने कावेरी नदी के कल्लानाइ पर पठार में विश्व का पहला जल नियंत्रक भवन बनाया था जो कि बहुत महत्वपूर्ण कार्य था | यह खेतीबाड़ी के मकसद से बनाया गया था |

मध्यकालीन चोल

चोलाओं ने अपनी शक्ति को 848 A D में पुनः प्रचलित किया और इनका शासन काल तीसरी शताब्दी A D से 9वीं शताब्दी A D के लंबी रुकावट के बाद दुबारा स्थापित हुआ | इसकी अपनी राजधानी थंजौर थी | यह पल्लवा का जागीरदार था | इसने पादुकोट्टाई मे सोलेसवारा मंदिर का निर्माण किया |

विजयालया चोल

मध्यकालीन का प्रथम चोल शासक विजयालया चोल था जिसे चोल शासन को पुनः स्थापित करने का  श्रेय जाता है| विजयालया की अपनी राजधानी थंजौर में थी | वह पल्लावाओं का दास था | इसने पादुकोट्टई में सोलेसवरा मंदिर बनाया |

अदित्या चोल 1

विजयालया का बेटा, अदित्या चोल उसकी मृत्यु के बाद उत्तराधिकारी बना | शिव का बड़ा भक्त होने के कारण इसने कावेरी नदी के किनारों पर काफी शिव मंदिरों का निर्माण किया |

परांतका चोल 1

इसने पाण्ड्य राजा को हराया और मदुरकोण्डा का खिताब धारण किया |

राजराजा चोल 1

कुछ कम जानकार राजाओं के बाद, राजराजा चोल 1 ने राजगद्दी संभाली | इसका नाम जन्म के समय अरुल्मोज़्हि वर्मन था | इसे अरुन्मोज़्हि उदयर पेरिया उदयर के नाम से भी  जाना जाता है | इसके समय चोल साम्राज्य ने पूरा तमिलनाडु , कर्नाटक, उड़ीसा के भाग और आंध्र प्रदेश, पूर्ण केरल और श्रीलंका  को समाविष्ट कर लिया | राजराजा चोल 1 ने  थंजौर में राजराजेश्वरम मंदिर का निर्माण किया जो  अब यूनेस्को की विश्व धरोहर है | यह मंदिर पेरुवुडाइयर कोविल या बृहदीस्वरर मंदिर के नाम से जाना जाता है |

राजेंद्र चोल 1

राजराज चोल1 के बाद 1014 A D मे इसका बेटा राजेंद्र चोल1 उत्तराधिकारी बना जिसने 1044 A D तक शासन किया | वह राजराज चोल1 से भी  ज्यादा  महत्वाकांशी था | इसके मुख्य आक्रमण और विजय निम्न है :

इसने पूर्ण श्रीलंका को जीत किया और उसके राजा को 12 साल तक बंदी बनाए रखा |पश्चिमी चौलक्य सम्राट को मसकी के युद्ध मे हारने के बाद पूर्वी चौलक्य को भी ज़बरदस्ती आत्मसमर्पण के लिए विवश कर दिया |इसकी सेनाओं ने कलिंग, पाल और गंगस पर विजय प्राप्त कि और इसने इससे गंगाईकोण्डा की उपाधि दी |उल्लेखनीय ढंग से राजेंद्र 1की जल सेना ने मालया और सुमात्रा राज्यों को पराजित किया तथा केदाह पर कब्ज़ा कर लिया |राजेंद्र चोल-1 ने चोल साम्राज्य की नई राजधानी गंगाईकोण्डा चोलपुरम, कलिंग , पल और गंगस के ऊपर विजय दर्शाने के लिए बनाई |

राजाधिराज चोल

राजेंद्र चोल-1 का उत्तराधिकारी राजाधिराज था | यह मैसूर के निकट कोप्पम के युद्ध मे मारा गया |

राजेन्द्र चोल-II

कविता और नृत्य का महान संरक्षक, इसने अपना समर्थन संगीत नृत्य नाटिका राजराजेस्वर नाटकम को दिया |

विराराजेन्द्र चोल

एक प्रभावकारी शासक जिसका शासन 1063-1070 A D तक था | वह राजेन्द्र चोल का छोटा भाई था | वह एक महान योद्धा के साथ साथ कला का महान प्रशंसक था |

इसके बाद अथिराजेन्द्र चोल के द्वारा पदभार संभाला गया जो अपने राज्य की रक्षा करने में ज्यादा शक्तिशाली नहीं था | उसके शासन में राष्ट्र विद्रोह हुआ जिसमे वह मारा गया | इसकी मृत्यु के बाद मध्यकालीन चोल राजवंश समाप्त हो गया |

बाद के चोल

बाद के चोलाओं का शासन काल 1070 A D से 1279 A D  तक रहा | इस समय तक, चोल साम्राज्य ने शिखर को प्राप्त किया और विश्व का  सबसे शक्तिशाली देश बन गया | चोलाओं ने दक्षिण पूर्व एशियन देश पर कब्ज़ा कर लिया और उस समय इनके पास विश्व की सबसे शक्तिशाली सेना व जल सेना थी |

पाण्ड्य साम्राज्य 

पाण्ड्य राज्य दक्षिण भारत के तमिलनाडु में स्थित था | यह लगभग 6ठी शताब्दी B C में शुरू हुआ और लगभग 15वीं शताब्दी A D  में समाप्त हो गया |

पाण्ड्य राज्य  का संगम युग मे विकसित आज के मदुरै के जिले, तिरुनेल्वेली, तमिलनाडू में रामनद के साथ बढ़ा | मदुरै राजधानी शहर था और कोरकाई राज्य का मुख्य पोत था जोकि व्यापार और वाणिज्य का केंद्र बना | संगम साहित्य पाण्ड्य राजाओं की लंबी सूची बताता है जिसमें  कई राजा  बहुत प्रसिद्ध हुए | मधूकुदुमी ने अपनी जीत को मनाने के लिए कई बलिदान दिये | इसलिए , इसे पल्यागसलाई की उपाधि दी गई |

एक दूसरा पाण्ड्य राजा बूथा पंडिया एक महान योद्धा था और तमिल कवियों का प्रशंसक भी था | आरियाप्पडाइकदंथा नेडुंजेलियन भी एक प्रसिद्ध पाण्ड्य शासक थे | उन्होने सिलप्पाथिगरम (महाकाव्य) के नायक को गलती से मृत्युदंड दे दिया था जिसका सच जानने पर उन्होने अपना जीवन त्याग दिया |

एक अन्य महत्वपुर्ण शासक थालाइयलंगनथु नेदुंजेल्लियन था जिसका शासन लगभग 210 A D  तक रहा जिसने चेरा, चोल और पाँच अन्य छोटे राज्यों की संघटित सेना को थलाइयलंगनम नामक जगह पर पराजित किया, जिसका व्याख्या 10 वीं सदी के अभिलेख में की गई है | इसने कई तमिल कवियों को आश्रेय दिया जिसमे मंगुड़ी मरुथनर भी थे | पाण्ड्य राज्य का  रोमन साम्राज्य के साथ व्यापार था जिसने व्यापारियों को लाभान्वित किया और राज्य को धन संपन्न और खुशहाल बनाया | जतवर्मन सुंदरा पाण्ड्य ने पाण्ड्य साम्राज्य पर 1251-61 A D तक शासन किया जिसे श्रीलंका के द्वीपों को जीतने की वजह से “द्वितीय राम” कहा गया |

पाण्ड्य का शासन 14वीं शताब्दी के शुरुआत से खत्म होने लगा जब राजगद्दी के उत्तराधिकारियों के दावे  लिए मतभेद शुरू हो गए और एक दावेदार ने दिल्ली के सुल्तान अलाउद्दीन खिलजी,से मदद मांगी जिसका नतीजा मलिक काफ़ुर के नेतृत्व में सुलतान का आक्रमण था | मुस्लिम आक्रमण की वजह से पाण्ड्यों का सफाया हो गया |